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Monday, August 18, 2025

तांडव

Covid के समय में लिखी हुई कुछ पंक्तिया  

 

तांडव चारों  और मचा है लिक्खूँ मैं किस कालिख से 

आंसुओं का शोर मचा है लिक्खूँ मैं किस कालिख से 


 

वो देखो एक लाश बेचारी जलने को बेताब हुई 

देखो वो समशान में देखो कितनी बड़ी  कतार हुई

प्राणवायु की आस लगा के घुट घुट के दम तोडा होगा 

मरने पर भी चैन कहाँ  ये बिना चिता लाचार हुई 

रात दिन बस बिना रुके अंगार ये सब को खाता जाता 

उम्मीदों का ढ़ेर जला है लिक्खूँ मैं किस कालिख से  ... तांडव चारों 

                               -- सौरभ जोषी  


Wednesday, September 18, 2013

ग़ज़ल : डरता है

 Found this gazal on : https://aasvad.wordpress.com/2013/07/20/f-008/

Awesome gazal and the blog "aasvad" is very good as well.

यहाँ हर शख़्स हर पल हादिसा होने से डरता है |
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है |


मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा बच्चा,
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है |


न बस में ज़िन्दगी इसके न क़ाबू मौत पर इसका,
मगर इन्सान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है |


अज़ब ये ज़िन्दगी की क़ैद है, दुनिया का हर इन्सां,
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है |


राजेश रेड्डी

Monday, September 09, 2013

उर्दू ग़ज़ल : देखकर

मैं मुस्कुरा रहा हूँ धारे -तेग देखकर
हैरान है कातिल मेरा मंसूब: देखकर

धारे-तेग - तलवार की धार , मंसूब: - निश्चय

गर संग तर  हुआ तो मैं हूँ किस हिसाब में
मिज्गां -ए -यार को सरश्क-आलूद: देखकर

संग - पत्थर, तर - गीला, मिज़्गाँ - पलकें , सरश्क आलूद: - आंसू से भीगना

दीदार गर हुआ तो क़यामत ही आएगी
शर्मिंद: तेग है हिजाब़े यार देखकर

शर्मिंद: - लज्जित , तेग - तलवार, हिज़ाब - पर्दा

कोताहि-ए -किस्मत को इनायत समज़  लिया
लेटे  हज़ारों लोग सेजे-गम पे देखकर


कोताहि-ए -किस्मत - भाग्य की कमी, इनायत - वरदान , कृपा
सेजे -गम  - दुखों  की शय्या

दुनिया के लोग हैं  बड़े पक्के हिसाब के
 आबे-चश्म भी हैं  सरोक़ार देखकर

आबे-चश्म - आँसू , सरोकार - मतलब

हरम गया था  बारहा मैं माँगने दुःआ
लौटा मैं पै-ब-पै  ख़ुदा आजिज़ देखकर

हरम - मस्जिद , बारहा - बारबार , पै -ब -पै  - बारबार
आज़िज - लाचार

यों कम हुम मेरा जुनूं -ओ-शौके-जिस्त का
बिकता हुआ खुदा  सरेबाजार देखकर

जुनूं -ओ-शौके-जिस्त - जिंदगी की इच्छा और जूनून

सुखनवरों की भीड़ में पेहचान क्या अगर
खुश-आमदीद ना हुई 'सौरभ' को देखकर


सुखनवर - कवि
खुश-आमदीद - स्वागत

Thursday, September 22, 2011

ज़िन्दगी की शतरंज

ज़िन्दगी की शतरंज
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हम कुछ और नहीं,
हैं शतरंज के कुछ मोहरे

कभी चलते चाल सीधी,
कभी टेढ़ी ही चाल चलते,
हम कुछ और नहीं,
हैं  शतरंज के कुछ मोहरे

कभी रोक देती हमें कोई रूकावट,
कभी फांद कर उसे  आगे बढ़ते,
आ जाते कभी आमने सामने,
करते कुर्बान किसी को फायदे के लिए,
हो जाते हम कभी फ़ना किसी के लिए,
बढ़ जाते अकेले आगे कभी,
हम तरक्की की चाह में,
कभी मुकाबला करते आंधीयों का,
एक दिवार बन के,
हैं  कुछ काले कुछ उजले हमारे चेहरे
हम कुछ और नहीं,
हैं  शतरंज के कुछ मोहरे

खेलते हम अटपटे दाव,
कभी उलजाते, कभी खुद ही उलज जाते
रहेते शह देने की ताक में,
कभी जीत जाते,
खा जाते कभी मात,
हम कुछ और नहीं,
हैं  शतरंज के कुछ मोहरे

--सौरभ जोषी

Tuesday, July 19, 2011

ग़ज़ल

मेरी आँखे इस तरहा नमकीन सा तू कर गया
कुछ तो हूँ  जिंदा मगर थोडा कही मैं मर गया

इस कदर में तेज़ भागा वक्त की रफ़्तार से
मुड़ के देखा वक्त मेरा दूर पीछे रह गया

ढूंढता रहेता हूँ मुजको मैं ही अपने आपमें
कोई मुजको ये बता दे मैं कहाँ पर खो गया

गम नहीं मुजको मेरे मरने का बस इस बात पर,
इस बहाने दर्द सारा  मेरे दिल का तो गया

क्या किया तुने फ़तेह मुजको सिकंदर ए बता
गर तेरे अंजाम में तू बेवतन सा रह गया

ऐश शेखों  को यहाँ क़ाज़ी तेरे इन्साफ में
और कही पर भूखा नंगा कोई बचपन मर गया

यूँ न होती बेरहम दुनिया तेरे आगोश में
लगता तू  चादर तानकर इश्वर कहीं पर सो गया

जिंदगी भर मैंने दफनाये मेरे अरमान को
फर्क क्या पड़ता है गर मैं खुद दफ़न सा हो गया


क्यों करू खुद पर यकीं 'सौरभ' मुझे तू ये बता
छोड़कर बेहाल मुजको मेरा साया भी गया


--सौरभ जोषी

Sunday, September 12, 2010

Nice sher by Amir Khusro

खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार
                                  -- अमीर खुसरो